अस्तंबा यात्रा 2026: शहादा से सतपुड़ा तक पूरी जानकारी, रूट और परंपरा
(Astamba Rushi Yatra 2026)

नमस्कार मेरे प्यारे आदिवासी भाई-बहनों! 🙏
अस्तंबा यात्रा नंदुरबार जिले की सबसे प्रसिद्ध आदिवासी धार्मिक यात्राओं में से एक है।
यह यात्रा हर साल दिवाली के समय सतपुड़ा पर्वत में होती है।
मैं शहादा तहसील का रहने वाला हूँ।
जब धनतेरस का समय आता है, तो दिल में एक ही नाम गूंजता है — अस्तंबा ऋषि महाराज।
सतपुड़ा की ऊँची पहाड़ियों में यह पवित्र स्थान स्थित है।
यहां हर साल हजारों लोग पैदल चढ़ाई करते हैं।
वे मशाल जलाते हैं, ढोल बजाते हैं और रोश्या घास लेकर लौटते हैं।
यह सिर्फ एक यात्रा नहीं है।
यह हमारी परंपरा और पहचान है।
आज मैं आपको अपनी आँखों से देखी, दिल से महसूस की गई पूरी कहानी बताता हूँ। शहादा से कैसे जाएँ, क्या दंतकथाएँ हैं, क्यों स्त्रियाँ नहीं जातीं, पुरुष 1-2 महीने पहले कैसे तैयारी करते हैं, और 2026 में भीड़ क्यों और ज्यादा हो रही है — सब कुछ डिटेल में।
jayadivasi.com पर ये ब्लॉग इसलिए है ताकि हमारी नई पीढ़ी भी समझे कि हम कौन हैं और हमारी परंपराएँ कितनी मजबूत हैं।
अस्तंबा शिखर कहाँ है? हम शहादा वालों का आसान रूट
अस्तंबा शिखर सातपुड़ा पर्वत की चौथी रेंज में है, नंदुरबार जिले के धडगाव (अक्राणी) तालुका में।
ऊँचाई लगभग 4,347 फीट (1,325 मीटर) — कुछ जगहों पर 4,500 फीट तक लिखा मिलता है।
ये सतपुड़ा का सबसे ऊँचा या बहुत ऊँचा शिखर माना जाता है इस इलाके में।
शहादा से रूट (हमारे लिए सबसे आसान):
शहादा से बस या अपनी गाड़ी से तलोदा (करीब 30-40 किमी)।
तलोदा से धडगाव (धडगांव) तक (करीब 40-50 किमी, रास्ता जंगली लेकिन अच्छा)।
धडगाव से जुना अस्तंबा (पुराना अस्तंबा गाँव) तक बाइक से जा सकते हो — अब रास्ता काफी बेहतर हो गया है।
और पदयात्रा के लिए तलोदा से चांदसैली घाट होते हुए असली पदयात्रा शुरू: कोठार-देवनदी-असली-नकट्यादेव-भीम कुंड्या होते हुए शिखर तक।
रास्ता कठिन है — पगडंडियाँ, खाइयाँ, जंगल — लेकिन भावना इतनी मजबूत कि थकान महसूस नहीं होती।
दंतकथाएँ: महाभारत से आदिवासी दिल तक
हमारे बुजुर्ग दो कहानियाँ सुनाते हैं, दोनों में अश्वत्थामा का नाम है:
महाभारत वाली कथा :-

कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अश्वत्थामा (द्रोणाचार्य के पुत्र) ने पांडवों के पुत्रों की हत्या की। श्रीकृष्ण ने क्रोध में शाप दिया: “तुम अमर होगे, लेकिन माथे पर हमेशा जख्म रहेगा। तेल माँगते फिरोगे, कोई तुम्हें नहीं मारेगा।”
वो भटकते-भटकते सतपुड़ा की घाटियों में आए और यहाँ विश्राम किया। आज भी कुछ भाई कहते हैं कि रात में कोई अजनबी मिल जाता है, तेल माँगता है और रास्ता दिखा देता है — ये अश्वत्थामा का चमत्कार माना जाता है।
हमारी आदिवासी लोककथा
जब अश्वत्थामा यहाँ आए, तो हमारे देवता राजा पांठा और गांडा ठाकुर ने उन्हें आश्रय दिया। इसलिए वो आज भी हमारी रक्षा करते हैं। शिखर पर जगह बहुत कम है, फिर भी हजारों भाई चढ़ते हैं और सबको जगह मिल जाती है — ये उनका आशीर्वाद है।
कुछ कहानियाँ कहती हैं कि भीम कुंड की उत्पत्ति भी अश्वत्थामा से जुड़ी है — जब भीम उनके पीछे दौड़ा था, तो पानी का कुंड बन गया।
ये दंतकथाएँ सिर्फ कहानी नहीं, हमारी आस्था हैं।
यात्रा की तैयारी: 1-2 महीने पहले से शुरू
हमारे पुरुष भाई धनतेरस से 1-2 महीने पहले तैयारी में जुट जाते हैं:
रोज जंगल में घूमना, शरीर मजबूत करना।
नई चप्पलें, जूते, टॉर्च, पानी की बोतल खरीदना।
घर में पूजा-पाठ, नवस लेना (जैसे बच्चे की सेहत के लिए, फसल अच्छी हो इसके लिए)।
रोश्या गवत (पवित्र घास) की व्यवस्था, ढोल-मशाल का सामान।
मानसिक तैयारी: भजन सुनना, रोडाली गाने (दिलीप वालवी, विलास वालवी, जितू रहासे, सुरेश ठाकरे वाले) — ये गाने सुनकर जोश आता है!
महत्वपूर्ण परंपरा:
आज भी हमारे समाज में स्त्रियों की यात्रा पर रोक है। ये पुरानी परंपरा है — चिरंजीवी होने के कारण स्त्रियाँ नहीं जातीं। पुरुष जाते हैं, दर्शन लेकर घर लौटते हैं और पूरे परिवार को आशीर्वाद देते हैं।
यात्रा का पूरा अनुभव: स्टेप-बाय-स्टेप
धनत्रयोदशी से यात्रा शुरू, मुख्य दिन दिवाली। रात में मशाल जलाकर, ढोल की थाप पर चलते हैं। और चलते समय शिग्गर वाले बाबा की जय, अस्तंबा ऋषि महाराज की जय, मामा भांजा जय, देराणी जेठानी जय, ऐसी घोषणाएं देते हुए चलते है|
शुरुआत:
तलोदा होते हुए चांदसैली घाट से पैदल चढ़ाई। जंगल में जानवरों से सावधान रहना पड़ता है।
रास्ते के स्पॉट्स:

भीम कुंड — ठंडे पानी में स्नान, थकान उतर जाती है।
डाकिण दगड, हाकडो थेवो, झूला, गांड गिसरी, मामा-भांजा — हर जगह छोटी-छोटी पूजा।
शिखर पर: नवस पूरा करना, रोश्या गवत चढ़ाना, झंडा लगाना। सूरज निकलते ही अल्हाददायक ठंडी हवा, दूर-दूर सतपुड़ा का नजारा — लगता है जैसे अस्तंबा बाबा मुस्कुरा रहे हैं।

रात का मजा: सोंगाड्या पार्टी — नाच-गाना, भजन, ढोल। तीन राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश) के भिल, वासवे, कोकणा, पवार भाई आते हैं।
2025-26 में भीड़ बहुत ज्यादा हो गई है।. यूट्यूब पर रोडाली गाने वायरल होने से युवा भाई ज्यादा आ रहे हैं।. पिछले साल लाखों थे, इस बार और बढ़ने वाले हैं!.
ये यात्रा हमारी पहचान क्यों है?.
ये प्रकृति पूजा है, सामूहिकता है, संस्कृति संरक्षण है। हम आदिवासी हैं — जंगल हमारे घर, पहाड़ हमारे देवता। अस्तंबा यात्रा हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी हैं। नई पीढ़ी को साथ ले चलो, ताकि परंपरा कभी न रुके।

शहादा भाइयों के लिए प्रैक्टिकल टिप्स
बाइक से जुना अस्तंबा तक जरूर जाएँ।.
पानी, प्राथमिक दवा, टॉर्च साथ रखें।.
जंगल में सावधानी बरतें।.
रोडाली सुनकर जोश बनाए रखें!.
अस्तंबा ऋषी महाराज की जय!
जय आदिवासी! जय सतपुड़ा! 🚩⛰️
आपका अनुभव शेयर करो कमेंट में — कब गए? कितने दिन लगे? या पहली बार प्लान है? शेयर जरूर करें ताकि और भाई जुड़ें।
❓ अस्तंबा (Astamba) पर FAQs :-
1. अस्तंबा क्या है?
👉 अस्तंबा एक पवित्र पर्वत और धार्मिक स्थान है. जो महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में स्थित है।
यह स्थान खासकर आदिवासी समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. अस्तंबा पहाड़ कहाँ स्थित है?
👉 अस्तंबा पहाड़ महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में स्थित है।
यह अक्कलकुवा क्षेत्र में आता है और गुजरात सीमा के पास है।
3. अस्तंबा का धार्मिक महत्व क्या है?
👉 आदिवासी समुदाय अस्तंबा को एक पवित्र देवस्थान मानते हैं।
यहां लोग अपनी मनोकामनाएं पूरी होने के लिए पूजा और दर्शन करने आते हैं।
4. अस्तंबा यात्रा कब होती है?
👉 अस्तंबा की यात्रा मुख्य रूप से होली के समय (फाल्गुन माह) में होती है।
इस दौरान हजारों श्रद्धालु यहां पैदल यात्रा करके पहुंचते हैं।
5. अस्तंबा यात्रा में क्या खास होता है?
👉 इस यात्रा में:
लंबी पैदल चढ़ाई, पारंपरिक गीत और नृत्य, सामूहिक पूजा, प्रकृति के बीच धार्मिक अनुभव.
👉 यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव होता है।
6. क्या अस्तंबा केवल आदिवासी लोगों के लिए है?
👉 नहीं, अस्तंबा में कोई भी व्यक्ति जा सकता है, लेकिन यह स्थान विशेष रूप से आदिवासी समुदाय की आस्था से जुड़ा हुआ है।
7. अस्तंबा यात्रा कितनी कठिन होती है?
👉 अस्तंबा यात्रा थोड़ी कठिन मानी जाती है क्योंकि इसमें पहाड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है।
इसलिए श्रद्धालु शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार होकर जाते हैं।
8. अस्तंबा यात्रा के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
👉 आरामदायक कपड़े पहनें
पानी और जरूरी सामान साथ रखें
समूह में यात्रा करें
प्रकृति और स्थान की पवित्रता बनाए रखें
9. अस्तंबा और आदिवासी संस्कृति का क्या संबंध है?
👉 अस्तंबा आदिवासी संस्कृति और आस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह उनके धार्मिक विश्वास, परंपराओं और सामूहिक जीवन को दर्शाता है।
10. क्या अस्तंबा यात्रा पर्यटन के लिए भी प्रसिद्ध है?
👉 हाँ, अब यह जगह धीरे-धीरे ट्रेकिंग और धार्मिक पर्यटन के लिए भी प्रसिद्ध हो रही है।
अस्तंबा यात्रा नंदुरबार जिले की सबसे प्रसिद्ध आदिवासी धार्मिक यात्राओं में से एक है।
हर साल यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।




