आखाजी (अक्षय तृतीया) 2026: खानदेश का सबसे बड़ा त्योहार और आदिवासी नववर्ष
आखाजी / अक्षय तृतीया क्या है? – एक त्वरित परिचय :-

ये दोनों नाम असल में एक ही त्योहार के हैं। पूरे भारत में इसे अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के नाम से जाना जाता है – एक अत्यंत शुभ और पवित्र हिंदू त्योहार, जिसे ‘आखा तीज’ भी कहते हैं। ‘अक्षय’ यानी जिसका कभी क्षय (नाश) न हो। मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कार्यों, दान-पुण्य का फल अनंत और स्थायी होता है।
आखाजी से मेरी बहुत सारी यादें जुडी हुई है।
हम स्कूल में पढ़ते थे, फिर मई के महीने में हम सभी भाई बहनो को स्कूल में छुट्टिया लग जाती थी
और छुट्टियों में आज के जैसे कोई कोचिंग या क्लास नहीं होते थे।
तब मेरे मामा हम सभी भाई बहनो को और मम्मी को लेने के लिए गाओं से लेने लिए आते थे।
और फिर हम ख़ुशी ख़ुशी उनके साथ बस पर गाओं के लिए निकल जाते थे।
मनो उस वक्त सभी बंधनों से हमको मुक्ति मिल गयी है ऐसा अहसास उस वक्त हम सभी को होता था।
क्या आपके के साथ भी कोई यादें जुडी है ? तो हमको निचे कमेंट में जरूर बताये, तो चलिए जानते है विस्तार से –
आखाजी कब है?
2026 की तिथि: 19 अप्रैल (रविवार) को मनाई जाएगी। तृतीया तिथि 18 अप्रैल शाम 5:31 बजे से शुरू होकर 19 अप्रैल दोपहर 2:12 बजे तक है।
लेकिन खानदेश (Khandesh) में इस त्योहार का एक अलग ही रूप है – इसे यहाँ ‘आखाजी’ (Akhaji) कहा जाता है और यह दिवाली जितना ही बड़ा त्योहार माना जाता है।
आखाजी के बहुत सारे नाम है, जैसे कीआखाजी अक्षय तृतीया आखातीज आखात्री इत्यादि।
आइए, अब इस त्योहार को तीन अलग-अलग नजरियों से समझते हैं।
आज 19 अप्रैल 2026 को पूरे भारत में अक्षय तृतीया का पावन पर्व मनाया जा रहा है। लेकिन खानदेश (नंदुरबार, धुले, जळगाव) में यही त्योहार ‘आखाजी’ के नाम से जाना जाता है – और यहाँ यह दिवाली से भी बड़ा उत्सव होता है।
खास बात यह है कि आदिवासी समुदाय (विशेषकर भील, पावरा, गावित) के लिए आखातीज उनके पारंपरिक नववर्ष की शुरुआत का दिन है। यह त्योहार प्रकृति, कृषि, रिश्तों और संस्कृति का अद्भुत संगम है।
इस लेख में हम जानेंगे:
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खानदेशी आखाजी क्यों है इतनी खास?
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आदिवासी समुदाय इसे अपना नववर्ष क्यों मानता है?
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इस दिन क्या-क्या परंपराएं निभाई जाती हैं?
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और कैसे यह त्योहार हमारी जय आदिवासी साइट के मिशन से जुड़ता है।
📅 तिथि और महत्व (Akshaya Tritiya 2026 Date & Significance)
अक्षय तृतीया हिंदू कैलेंडर के वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। ‘अक्षय’ का अर्थ है – जिसका कभी क्षय न हो। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य, जप-तप, और शुभ कार्यों का फल अनंत होता है।
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तारीख: 19 अप्रैल 2026 (रविवार)
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तृतीया तिथि प्रारंभ: 18 अप्रैल शाम 5:31 बजे
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तृतीया तिथि समाप्त: 19 अप्रैल दोपहर 2:12 बजे
🔥 खानदेश का आखाजी – दिवाली से भी बड़ा उत्सव
खानदेश क्षेत्र (नंदुरबार, धुले, जळगाव, और कुछ हिस्से मध्य प्रदेश-गुजरात के) में आखाजी को लेकर एक अलग ही उत्साह होता है। यहाँ इसे ‘आखा तीज’ या ‘आखाजी’ कहा जाता है।
🟡 बंधनमुक्ति का दिन
आखाजी पर खानदेश का हर व्यक्ति बंधनमुक्त हो जाता है:
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शेतकरी (किसान) सारे खेत के काम बंद कर देते हैं।
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मजदूरों को छुट्टी मिलती है।
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दूर-दूर नौकरी करने वाले परिवार के साथ गाँव लौटते हैं।
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यहाँ तक कि जानवरों को भी इस दिन हल नहीं जोता जाता।
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मुझे याद है, जब मैं छोटा था, स्कूल की छुट्टियों मैं और मेरा पूरा परिवार मेरे दादाजी के घर जाते थे
गाओं में बड़ी ही मजा आती थी उस दिन बहार काम करने वाले या नौकरी करने वाले
जितने भी लोग थे वो अखाजी के दिन गाओं में अपने परिवार के साथ आखाजी मानाने के लिए गाँव आ जाते थे ।
उस दिन हमारे गाओं के किसान भी खेत में नहीं जाते थे। एक दिन पूरा परिवार के साथ बिताते थे।
पुरे गाओं में हर एक नीम के पेड़ को एक जुला झूलता हुआ दिख जाता था।
उसपर कुछ लड़किया, स्त्रियाँ, दिन भर झूला झूलते रहते थे और गाना गाते थे –
“आथानी कैरी तथानी कैरी झूइ झूइ झोका खाय व ”
ये एक अहिरानी भाषा का प्रसिद्ध लोकगीत है।
🟡 सास-माहेर का मिलन और भाई-बहन का प्यार
यह त्योहार रिश्तों को भी गहराई से जोड़ता है:
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ससुराल गई हर बेटी इस दिन अपने माहेर (मायके) आती है।
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उसकी निगाहें अपने भाई के आने का इंतज़ार करती रहती हैं।
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भाई अपनी बहन को माहेर ले जाता है – यह रिश्तों का सबसे सुंदर दृश्य होता है।
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पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खाता है, हंसता-गाता है।
🟡 पारंपरिक व्यंजन (Khandesh Special Recipes)
आखाजी के दिन खानदेशी पकवान बनाना लगभग अनिवार्य होता है:
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पुरणपोळी – मीठी भरी हुई रोटी (बाजरे या गेहूं की)
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आंब्याचा रस – कच्चे आम का शरबत या फिर पके आम का रस
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सांजोरी – चने की दाल और चावल के आटे से बनी खानदेशी मिठाई
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घुण्या – मूंग दाल और चावल के आटे की बनी हल्की-फुल्की मिठाई
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इस ख़ास दिन गोड-धोड खाना होता है, मतलब जो पूरण पोळी और आंब्याचा रस होता है
उसके साथ रशि, भात, कुर्डिया, भजी, पापड़, उडिड दाल के वड़े ये व्यंजन होते है।
और नैवेद्य के शिवाय घर के छोटे बड़े कोई भी खाना नहीं खाता है।
ये पूरण पोळी खपर पर तैयार करते है। खापर मतलब मिटटी का बर्तन होता है , उसको उल्टा करके चूल्हे पर रख दिया जाता है और फिर गरम होने पर उसपर पूरी या पुराण पोली को बनाया जाता है।
खापर की पूरण पोळी कैसे तैयार करते है ?

रात में या सुबह में उठकर चने की दाल को भिगोकर रख दिया जाता है या फिर धीमी आंच पर रखकर चने की दाल को
अच्छी तरह पकने दिया जाता है उसके बाद दाल में से पानी छानकर उसमे गुड़ मिलाया जाता है
और दोनों को सूजी की तरह सिलबट्टे पे या मिक्सर में बारीक़ कर लिया जाता है।
अब रोटी का आटा तैयार करके उसकी बारीक़ पुरिया तैयार की जाती है,
फिर उसके अंदर ये चने के दाल और गुल का मिश्रण भर दिया जाता है
और उसे रोटियों के तरह हाथ से घुमा घुमाकर बड़ी रोटी बनाई जाती है और
पर्याप्त आकार प्राप्त होने के बाद उसको खापर पर सेंकने के लिए दाल दिया जाता है।
नैवेद्य कैसे दिखाते है ?

मान्यता ये है की, हमारे जो पूर्वज होते है सबसे पहल उनको खाना खिलाये इस मान्यता के कारन
बाहर आंगन में खाने की थाली ले जाकर बड़े और बुजुर्ग सभी पकवानो का एक एक करके चूल्हे में घास डाला जाता है।
और ये भी मान्यता है की पूर्वजों का जो शोक है उसको भी चूल्हे में डाला जाता है
उदहारण के तोर पर अगर हमारा कोई पूर्वज जैसे की मेरे पप्पा तम्बाकू कहते थे तो चूल्हे में थोडीसी तम्बाकू भी डाली जाती है।
🟡 गवराई (Gavarai / Gaurai) की परंपरा
चैत्र पूर्णिमा से ही घरों में गवराई (गौरी माता) की स्थापना शुरू हो जाती है। आखाजी के एक दिन पहले:
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युवतियां पारंपरिक पोशाक पहनकर, गीत गाती हुई कुम्हार के घर से मिट्टी की गवराई की प्रतिमा लेकर आती हैं।
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इस प्रतिमा को घर के आंगन या चौक में स्थापित किया जाता है।
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अगले दिन आखाजी पर विधिवत पूजा करके विसर्जन किया जाता है।
🟡 खानदेशी शॉपिंग – साड़ी और जेवर
आखाजी पर नई साड़ी खरीदना शुभ माना जाता है। खासतौर पर ‘आखाजी पैटर्न’ वाली साड़ियों की बाजार में बहुत मांग रहती है।
कई परिवार इस दिन सोने-चांदी के जेवर भी खरीदते हैं – क्योंकि अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना बेहद शुभ माना जाता है।
🌾 आदिवासी समुदाय का नववर्ष – आखातीज / अखा तीज
अब सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा – यह त्योहार आदिवासी जीवन से कैसे जुड़ता है?
🌱 भीलों का नववर्ष (Bhil New Year)
भील समुदाय (जो नंदुरबार, धुले, बड़वानी, और राजस्थान के कुछ हिस्सों में बसते हैं) के लिए आखातीज (या अखा तीज) उनके पारंपरिक नववर्ष की शुरुआत का दिन है।
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कैलेंडर: आदिवासी समाज का अपना एक प्राकृतिक कैलेंडर होता है। जब आखातीज का चांद दिखाई देता है, तब से उनका नया साल शुरू होता है।
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प्रकृति-आधारित: आदिवासी हर त्योहार, हर रस्म को प्रकृति के साथ जोड़कर देखते हैं। मौसम के बदलाव के साथ ही उनके गीत, नृत्य, और उत्सव बदलते हैं।
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खेती की शुरुआत: यह दिन बीज बोने की शुरुआत का भी प्रतीक है। पूर्वजों को याद करके, वे प्रतीकात्मक रूप से खेती-बाड़ी की शुरुआत करते हैं।
🌱 पांच अनाज बोने की परंपरा (Panch Anaj Ritual)
आखातीज से सात दिन पहले:
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बांस की बनी छोटी टोकरी को गोबर से लिपा जाता है।
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उसमें पांच प्रकार के अनाज बोए जाते हैं – चावल, नागली (रागी), मक्का, बाजरा, उड़द।
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इस टोकरी को घर के किसी पवित्र स्थान पर रखा जाता है।
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आखातीज के दिन इन अंकुरित अनाजों को खेतों में ले जाकर बोया जाता है।
ये जो पांच अनाज बोन की परंपरा है , इसके बारे में मेरे दादा न कहा था की उनके ज़माने में पांच प्रकार के अनाज बोये जाते थे मैंने उनसे ये सुना था।
उसी प्रकार की परंपरा नवरात्र में मैंने मेरे बचपन में देखि थी।
मेरी दादी नवरात्र के दिनों में एक छोटीसी टोकरी में थोडीसी गीली मिटटी लेकर उसके ऊपर गेहूं के दाने डाल देती थी
और फिर उन नौ दिनों में वो धान अंकुरित हो जाते थे और हम उसे दसवे दिन नदी में विसर्जित कर देते थे।
🌱 अनुष्ठान, नृत्य और गीत
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गौराई यात्रा: भील समुदाय में महिलाएं गौराई माता (एक लोक देवी) की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर, गीत गाती हुई, पूरे गाँव में घूमती हैं।
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खखरा शादी: युवा खखरा के पत्तों से दूल्हा-दुल्हन बनाते हैं और उनकी भील फेरे रचाते हैं। यह एक प्रकार का प्रतीकात्मक विवाह होता है, जो समुदाय में एकता और परंपरा के निर्वहन का प्रतीक है।
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प्रकृति पूजन: पेड़ों के नीचे एकत्रित होकर पूर्वजों को सवैया (मीठा व्यंजन) और देशी शराब अर्पित की जाती है।
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मानसून की भविष्यवाणी: पुरुष हुन (सन) की रस्सियाँ बुनते हैं – यदि रस्सी फैलती है तो अच्छी बारिश और फसल का संकेत, नहीं तो विपरीत।
🌱 आदिवासी दर्शन – प्रकृति से जुड़ाव
यह त्योहार हमें आदिवासी दर्शन का एक बड़ा सबक देता है – प्रकृति के साथ सद्भाव से रहना, उसका सम्मान करना, और उसके चक्रों के अनुसार अपने जीवन को ढालना।
जहाँ आधुनिक दुनिया में हम कैलेंडर की डेट देखकर त्योहार मनाते हैं, वहीं आदिवासी समाज प्रकृति के संकेतों (पेड़ों का फूलना, पक्षियों का आना-जाना, चांद-तारों की स्थिति) के आधार पर अपने पर्व तय करता है।
🚜 किसानों का त्योहार – नई फसल की शुरुआत
भारत एक कृषि प्रधान देश है, और आखाजी किसानों के लिए भी बेहद खास है:
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शेती का विराम: पूरे खानदेश में इस दिन कोई भी किसान खेत में नहीं जाता। सारे हल, बैल, ट्रैक्टर आराम करते हैं।
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बीज बोने की शुभ शुरुआत: भील समाज में इसी दिन से खेतों में नए सीजन की बुवाई शुरू होती है।
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फसल की भविष्यवाणी: प्रकृति के संकेतों को पढ़कर बुजुर्ग बताते हैं कि आने वाला मानसून कैसा रहेगा – सूखा या भरपूर बारिश।
मेरे दादा और दादी ने मुझे बताया था की,
इसी दिन का मुहूर्त देखकर किसान लोग खेती की तैयारियां शुरू कर देते है।
क्यों की इस आखाजी त्यौहार के बाद जून के महीने में बरसात का मौसम शुरू हो जाता है।
किसान भाई बाजार में जाकर धान के बीज ले आते है, और उसकी बोआई शुरू की जाती है।
साथ में बहुत सारे किसान प्रकृति के संकेतों को पढ़ने की कोशिश करते है ,
और इस साल की बारिश के बारे में पूर्वानुमान बताते है
और सभी किसान भाईयों की यही अपेक्षा होती है की इस साल सूखा ना पड़े।
📸 हमारी जय आदिवासी साइट – क्यों है यह पोस्ट खास?
हमारी वेबसाइट Jayadivasi.com का मिशन है – पूरे भारत के आदिवासी समुदायों की संस्कृति,
परंपराओं और जीवनशैली को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करना।
हम नंदुरबार जिले (सातपुड़ा की पहाड़ियों के बीच) से संचालित होते हैं।
हमारे परिवार और आसपास के लोग भील, पावरा, गावित, कोकणा जैसी जनजातियों से आते हैं।
हमने बचपन से यहाँ के हाट बाजार, जंगली फल (रानमेवा), त्योहार, और रीति-रिवाज बहुत करीब से देखे हैं।
इसीलिए इस पोस्ट में हर जानकारी स्थानीय अनुभव पर आधारित है।
और सबसे बड़ी बात – इस पोस्ट में लगाई गई तस्वीरें हमारे
आसपास के गाँव और त्योहार की रीयल फोटोज हैं, AI से नहीं बनाई गईं।
अब यहाँ पर जो पुराण पोली वाली फोटो है
वो मेरे दोस्त के घर से मैंने मंगाई है वो रियल फोटो है।
वैसे ही जो मैंने तुमको पूरी थाली दिखाई है
वो भी रियल है। इस ब्लॉग में AI से फोटो नहीं डेल गए है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: आखाजी और अक्षय तृतीया में क्या अंतर है?
उत्तर: कोई अंतर नहीं है। अक्षय तृतीया पूरे भारत में प्रचलित नाम है, जबकि खानदेश क्षेत्र में इसे स्थानीय बोली (खानदेशी, अहिराणी) में ‘आखाजी’ या ‘आखा तीज’ कहा जाता है।
प्रश्न 2: क्या यह त्योहार सिर्फ हिंदू समुदाय मनाता है?
उत्तर: आदिवासी समुदाय (भील, पावरा, गावित) भी इसे अपने पारंपरिक तरीके से मनाते हैं। हालाँकि उनके रीति-रिवाज थोड़े अलग होते हैं (जैसे पूर्वजों को देशी शराब अर्पित करना, गौराई यात्रा, खखरा शादी आदि), लेकिन मूल रूप से यहफसल, प्रकृति और नववर्ष का उत्सव है।
प्रश्न 3: इस दिन सोना खरीदना क्यों शुभ है?
उत्तर: पौराणिक मान्यता है कि इस दिन कुबेर (धन के देवता) और लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद मिलता है। सोना खरीदने से धन में कभी कमी नहीं आती – यह ‘अक्षय’ की अवधारणा से जुड़ा है।
प्रश्न 4: क्या आजकल आखाजी की परंपराएं बदल गई हैं?
उत्तर: हाँ, शहरीकरण और आधुनिकता का असर पड़ा है। पहले पूरा गाँव मिलकर गवराई लाने जाता था,
अब सिर्फ कुछ महिलाएँ जाती हैं। पहले सभी पारंपरिक पकवान घर पर बनते थे,
बाजार से रेडीमेड ले आते हैं। लेकिन गाँवों और आदिवासी बस्तियों में आज भी पुरानी परंपराएं जीवित हैं।
अब अगर देखा जाये तो पहले जैसी परम्पराये नहीं रही पहले आस पास और पड़ोस में वो लाड प्यार दिखाई देता था अब वो नहीं रहा।
हम सभी भाई बहन गाओं जाते थे तो वह पर सभी तरफ से हमको खाना खाने के लिए ख़ुशी से बुलाते थे
वहा पर हम आम रास पूरी खाते थे और खूब गप्पे लड़ाते थे और सभी खाना घर पर ही बनाया जाता था
लेकिन अब बाहर से पुराण पोली मंगाई जाती है। और लोगों के पास इतना वक्त भी नहीं बचा है अब ।।।।
🎉 निष्कर्ष
आखाजी (अक्षय तृतीया) सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है – यह खानदेश की सांस्कृतिक पहचान,
आदिवासी जीवन का नववर्ष, किसानों के लिए नई शुरुआत, और परिवारों के मिलन का पर्व है।
जहाँ एक ओर पूरा देश सोना खरीदने और दान-पुण्य करने में व्यस्त होता है,
वहीं नंदुरबार, धुले, जळगाव की पहाड़ियों में आदिवासी भाई-बहन इस दिन प्रकृति को धन्यवाद देते हैं,
अपने पूर्वजों को याद करते हैं, और आने वाले साल की अच्छी फसल की कामना करते हैं।
जय आदिवासी परिवार की ओर से सभी को आखाजी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
अक्षय तृतीया की सभी को बहुत-बहुत बधाई। 🙏





